हरे कृष्णा
आज हम जानेगे भगवान श्री जगरन्नाथ ,सुभद्रा और बलदेव की श्रीविग्रह / मूर्ति के रहस्ये के बारे में कि आखिर क्यों है उनकी प्रतिमा अधूरी और सबसे अनोखी |
भगवान श्री जगरन्नाथ जो ओड़िशा के पूरी में समुद्र तट के किनारे अपने बड़े भाई बलदेव और छोटी बहन सुभद्रा के साथ बसे है और अपने भक्तो को दर्शन देते है और वो भगवान श्रीजगन्नाथ जो सम्पूर्ण जगत के नाथ अर्थात स्वामी है और सब के मन को मोह लेने वाले है जिनके नाम लेने और दर्शन मात्र से मनुष्य के सभी दुखो का नाश हो जाता है |
आप सब ने जब भी भगवान जगरन्नाथ के दर्शन किए होंगे तो देखा होगा की भगवान श्रीजगन्नाथ,सुभद्रा और बलदेव की मूर्ति और सभी भगवान जैसे राम,कृष्ण या फिर सभी देवी देवताओ से काफी अलग और अनोखी है आखिर क्यों उनकी मूर्ति मे उनके पैर नहीं होते है और हाथ भी पूरा नहीं बने हुए है ऐसा होने के पीछे क्या कारण है आज हम आपको बताएगे | इसके साथ -साथ हम आपको ये भी बतएगे कि आखिर उनकी प्रतिमा बाकि भगवान और देवी देवता की तरह मनुष्य के जैसा क्यों नहीं है और उनकी आँखे इतनी बड़ी -बड़ी क्यों है और क्यों आखिर नीम की लकड़ी से ही बनाई जाती है|
शास्त्रों मे कथा आती है जब भगवान श्री कृष्ण जब द्वारका नगरी मे रहते थे और अपना राज पाठ संभालते थे तब एक दिन उनकी मुख्य आठ रानियों को श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं के बारे मे जानने का बड़ा मन किया तब उन्होंने रोहिणी माता से आग्रह किया की वो उनको श्रीकृष्ण की बाल लीलाओ के बारे में बताए तब पहले तो उन्होंने मना कर दिया परन्तु बार -बार आग्रह करने पर वह मान गयी लेकिन उन्होंने एक शर्त रखी की उनकी बात श्री कृष्ण और भाई बलराम ना सुने तब उन्होंने कक्ष के द्वार पर उनकी छोटी बहन सुभद्रा को खड़ा कर नज़र रखने को कहा तत्पश्चात रोहिणी माता श्री कृष्ण की बाल लीलाओं की कहानियाँ सभी रानिओ को कहने लगी| कहानी इतनी मनमोहन थी मानो वह वहा साक्षात् हो और सब देख रही हो और आनंद ले रही हो | और यह सब सुनकर सब कहानियो में ही इतने खो गयी और साथ साथ उनकी बहन सुभद्रा जो द्वार पर कान लगा कर उन कहानियों को सुन रही थी वह भी उन कहानियों में इतनी खो गयी की पता ही नहीं चला की कब भगवान कृष्ण और बलराम भी वहा आ गए और उनके अगल -बगल वहा आकर खड़े हो गए और बाल लीलाओं की कहानी का आनंद लेने लग गए इसका किसी को पता ही नहीं लगा | अब वह तीनों बाल लीलाओं के भाव में इतने मग्न को गए की पलक भी जपकाना भूल गए | इस भाव के साथ धीरे -धीरे उन तीनों की आँखे बड़ी होने लगी और हाँथ पाँव अंदर की तरफ सिमटते लग गए | तीनों उन लीलाओ को सुनने में इतने खो गए की उनको और किसी बात की सूद ही नहीं रहा| फिर उनके ऐसे रूप को देख स्वयं नारदमुनि वहा प्रकट हो गए और फिर तीनो पुनः सामान रूप में आ गए लेकिन फिर नारदमुनि बड़ी ख़ुशी सेभगवान से विनती करते है कि हे प्रभु अभी -अभी जो मैनें आपका यह प्रेममय और अनोखा रूप देखा उसके दुबारा कब दर्शन होंगे | नारदजी चाहते थे की भगवान श्रीकृष्ण के इस सुन्दर रूप का दर्शन सब भक्तो को मिल सके जिसके दर्शन मात्र से ही सब भक्तो का कल्याण हो सके |
तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा की वो अपने इस रूप के साथ कल्युग में अवतरित होंगे और साथ ही ये भी बताया की उस समय इन्द्रद्युम्न नाम के एक महान राजा होंगे जो मेरे इस स्वरूप की प्रतिमा की स्थपना पुरुषोत्तम क्षेत्र मे करवाएगें |
इस तरह स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने नारदमुनि जी को खुद बताया था की वह कल्युग मे श्रीजगन्नाथ के रूप में अवतार लेंगे और अपने भक्तों को दर्शन देंगे |
अब हम आपको ये बतएगे कि आखिर यह प्रतिमा बनी कैसे और पूरी के मंदिर तक पहुँची कैसे
आज से कई हजारों सालो पूर्व एक महान राजा हुआ करते थे जिनका नाम था इन्द्रद्युम्न | प्रजा उनके साशन काल में बहुत खुश थी | परन्तु फिर भी उस राजा के मन में एक सवाल चलता रहता था| तब उन्होंने बड़े -बड़े महान और ज्ञानी ऋषियों को वहा बुलाकर उनसे सवाल किया की पूरी धरती पर कोई तो ऐसा स्थान होगा जहा जाने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हो और जहा साक्षात् भगवान के दर्शन होते हो | तब वहा आये एक ब्राह्मण राज ने उन्हें पुरुषोत्तम क्षेत्र के विषय के बारे में बताया | उन्होंने राजा को निलांचन पर्वत के बारे में बताया जहा भगवान श्री कृष्ण नील माधव के रूप में प्रकट हुए है |उनके इस रूप का दर्शन करने से मनुष्य का कल्याण को जाता है | तब उस ब्राम्हण की बात सुनकर राजा ने तुरंत अपने आदमियों को वह निलांचन पर्वत खोजने को कहा ताकि वह भी वहा जाकर भगवान नीलमाधव के दर्शन कर सके |तब सभा में विद्यापति नाम के एक ब्राह्मण थे जो इस पर्वत की खोज करने के लिए राज़ी हुए और वह उस पर्वत की खोज में निकल गए| एक महीने के कठिन प्रयास के बाद विद्यापति को निलांचन पर्वत का पता चला जिसपर उस समय सबर जाती के लोगो का वास था |और वहा के राजा थे विश्ववाशु| |एक माह बाद जब विद्यापति निलांचन पर्वत पहुँचे तब वह उनके राजा विश्ववाशु से मिले और उन्हे सारी बात बताई जिसके बाद विश्ववाशु चिन्ता में पड़ गए क्यों कि वह काफ़ी समय से नीलमाधव की पूजा किया करते थे और साथ ही उन्हें उस भविष्यवाणी के बारे में भी पता था की एक दिन एक राजा नीलमाधव को लेने आएंगे जिसके बाद भगवान का वह स्वरूप अप्रकट हो जायेगा | तो इस चिंता के कारण उस राजा ने उन्हें नीलमाधव के बारे में कुछ भी नहीं बताया | लेकिन विद्यापति बहुत थक गए थे तो राजा ने उन्हें विश्राम करने को प्रस्ताव दिया | जिसके बाद
विद्यापति कुछ समय तक वहाँ रुके और बार -बार नीलमाधव के बारे में पूछते रहे लेकिन राजा ने उन्हें कुछ भी नहीं बताया |
कुछ समय बाद राजा विश्ववाशु ने विद्यापति को अपनी पुत्री ललिता के विवाह का प्रस्ताव दिआ और इस तरह विद्यापति और ललिता का विवाह हो गया | तो अब विद्यापति विश्वासु के दामाद बन गए थे और उनके साथ ही रहने लगे थे | इस दौरान विद्यापति ने एक बात गोर करी की कि राजा विश्वासु हर रोज नियम से रात को कही जाते है और अगले दिन सूर्योदय के बाद ही वापस लौटते है और जब वह लोटते है तो उनके शरीर से बहुत सुगन्धित खुशबू आती है | तो इसके बारे में उन्होंने अपनी पत्नी ललिता से पूछा,पहले तो उनकी पत्नी ने अपने पिता को ध्यान में रखते हुए बात छुपाने की कोशिश करी पर बार -बार पूछने पर उन्होंने बताया कि रोज उनके पिता नीलमाधव की पूजा करने जाते है जो की उनके कुल देवता है और यह उनकी कुल परम्परा है | यह जानकर विद्यापति बहुत खुश हो जाते है क्योंकि अब जाकर उनकी तलाश पूरी हुई और वह सीधा जाकर विश्वासु से विनती करते है कि उन्हें भी नीलमाधव के दर्शन करने है | हालाकि विश्वासु ऐसा चाहते तो नहीं थे लेकिन अब वह दामाद को मना कैसे कर सकते थे | तो वह मान गए लेकिन राजा विश्वासु ने एक शर्त रखी की वो विद्यापति को उनकी आँखो में पट्टी बाँधकर उन्हें वहा ले जायेगे | वैसे विद्यापति भी कम चालाक नहीं थे उन्होंने वह शर्त मान ली और अपनी जेब में सरसो के दाने भर लिए जिसमे छोटा सा छेद था ताकि रास्ते में जाते -जाते उसे गिराते जाये और कुछ समय बाद उनके बड़े होने पे उस रास्ते की पहचान कर सके | तो आखिर कार भगवान नीलमाधव के दर्शन के बाद विद्यापति ने वापस लोट आये और फिर अपने घर वापस जाने की बात कही और फिर लौट आए | लौटने के बाद उन्होंने राजा इन्द्रद्युम्न को सारी बात बताई और निलांचन का पता भी बता दिया | जिसके बाद राजा इन्द्रद्युम्न बहुत खुश हुए और तुरंत उनके दर्शन करने चाहे | अब वह सरसो के बीज बड़े हो गए थे जिसकी मदत से विद्यापति रास्ते का पता लगाकर राजा इन्द्रद्युम्न को निलांचन पर्वत ले गया| लेकिन राजा के वहा पहुँचने से पहले ही नीलमाधव वहा से अप्रकट हो चुके थे| और यह देख राजा इन्द्रद्युम्न बहुत दुखी हुए और उन्हें लगा की उनके डर से राजा विश्वासु ने उसे कही छुपा दिया है परन्तु उनके पूछने पर साफ इंकार कर दिया की उनहोंने मुर्ति को नहीं छुपाया | यह जानकर राजा इन्द्रद्युम्न निराश हो गए और उनकी आशा टूटने लगी | फिर वो वहा से वापस लोट आये | फिर एक दिन भगवान राजा इन्द्रद्युम्न के स्वपन में आकर बताते है की ये सब उनकी इच्छा से हुआ है और अब वह जगरन्नाथ के रूप में प्रकट होने को तैयार है जो की दारु भ्रम अर्थात लकड़ी का बना होगा और साथ ही भगवान ने राजा इन्द्रद्युम्न को बस एक भव्य मंदिर बनाने को कहा जहाँ उनकी मूर्ति की स्थापना स्वयं भ्रमा जी करेंगे | इसके साथ ही उन्हें पूरी के समुद्र तट पर जाने को कहा जहा उन्हें लकड़ी के तने का टुकड़रा बहता हुआ मिलेगा जिससे मूर्ति बनेगी | भगवान की आज्ञा के बाद राजा अपनी सेना के साथ समुद्र किनारे गए और प्रतीक्षा करने लगे थोड़ी समय बाद सच मुच वहा उन्हें समद्र में एक लकड़ी का तना बहता दिखा जो किनारे आ गया | लेकिन राजा की पूरी सेना भी उस लकड़ी के तने को उठा नहीं सकी तब भगवान ने राजा को सन्देश दिया की मेरा एक परम भक्त विश्वावसु ही उसे उठा सकता है तब विश्वावसु को वहा बुलाया गया और विश्वावसु ने बड़ी ही खुशी के साथ लकड़ी को उठकर राजा के महल तक पहुँचा दिया | इसके बाद लकड़ी को मूर्ति का आकार देने की बात उठी तो स्वयं विषकर्मा जी बूढ़े के भेष में वहा आये और राजा से कहा की वह यह काम करने के लिए तैयार है लेकिन उन्होंने इसके लिए इक्कीस दिनों का समय मांगा और साथ ही यह शर्त भी रखी की वह यह काम एकांत कमरे में अकेले ही करेंगे जहाँ कोई गलती से भी न आये और न ही कोई उनसे कोई खाने- पीने के लिए पूछने आये | यह सुन राजा थोड़े हेरान हुए लेकिन भगवान की मूर्ति बनवाने को उत्साहित थे तो उन्होंने उनकी सारी शर्त मान ली | इसके बाद उन्हें एक एकांत कमरा दे दिया गया| वैसे विश्कर्मा जी वहा खुद भगवान की इच्छा से यहाँ आये थे |
आखिर कार गारू भ्र्म को आकार देने का काम शुरू हुआ | राजा रोज़ दरवाज़े के पास आते और कान लगा कर काम होने की आवाज़ सुनते | पन्द्रह दिन तक रोज़ उन्हें आवाज़ सुनाई देती लेकिन एक दिन अचानक उन्हें अंदर से आवाज़ आना बंद हो गई तो अब राजा इससे बड़े चिंतित हो गए की कही उस बूढ़े व्येक्ति को कुछ हो तो नहीं गया क्योंकी काफी समय से उस बूढ़े व्यक्ति ने कुछ खाया -पिया नहीं और वैसे भी दिखने में वह काफी भुढा था तो कही वह मर तो नहीं गया |तो यह सोच कर अब राजा से रहा नहीं गया और उसने शर्त का उलंघन कर दवाज़ा खोल दिया|
दरवाज़ा खोलते ही वहा से बूढ़ा व्यक्ति अद्रिशय हो गया और राजा ने देखा की भगवान जगरन्नाथ के साथ सुभद्रा और बलदेव की प्रतिमा अधूरी ही बानी रह गई | राजा इन्द्रद्युम्न यह सोच फिर दुखी हुए की उसके शर्त तोड़ने के कारण प्रतिमा अधूरी रह गयी और पूरी ना बन पाई | और फिर नारद जी वहा प्रकट होते है और उहे हिम्मत देते हुए पूरी बात बताते है की यह प्रतिमा अधूरी नहीं पूरी है इस रूप का दर्शन मैंने खुद द्वापर में किया है और नारद जी ने पूरी घटना राजा को बताई और ये भी बता की उस समय मैने भगवान श्रीकृष्ण से इस रूप में पुनः प्रकट होने की विनती की थी ताकि इस रूप का दर्शन करके सब का कल्याण हो सके | यह सारा काम आपके ही माध्यम से ही होना था तो वही अब हो रहा है इसमें आपकी कोई गलती नहीं है | फिर नारद जी ने उन्हें एक भव्य मंदिर बनाने को कहा तब राजा ने अपने सभी कारीगर को इस काम में लगा दिया | इसके बाद नारद जी राजा को बह्रमा जी के पास ले गए ताकि उन्हें मूर्ति की प्राण प्रतिस्टा के लिए आंमत्रित कर सके | इसके बाद स्वयं बह्रमा जी ने भगवान श्री जगरन्नाथ सुभद्रा और बलदेव की मूर्ति की प्राण प्रतिस्टा करी |
तो हम उम्मीद करते है की आपको अब पता चल गया होगा की भगवन श्रीजगन्नाथ सुभद्रा और बलदेव की मूर्ति अधूरी नहीं बल्कि पूरी है और साथ ही ये भी पता चल गया होगा की क्यों उनकी मूर्ति और सभी भगवान और देवी -देवता से अलग है |
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