हरे कृष्णा
आज हम आपको बातयेगा की क्यों हर साल ओड़िशा के पूरी में भगवान श्री जगरन्नाथ जी की रथ यात्रा होती है |
भगवान जगन्नाथ जो साक्षात श्री कृष्ण के अवतार हैं वह ओड़िशा में समुद्र तट के किनारे पुरी में अपने बड़े भाई बलभद्र और छोटी बहन सुभद्रा के साथ विराजमान है | वो भगवान श्री जगरन्नाथ जो सम्पूर्ण जग के नाथ है अर्थात स्वामी है वो भगवान दया और कृपा के सागर है |
यह जगरन्नाथ पुरी जो चार धामो (रामेश्वरम ,बद्रीनाथ, पुरी और द्वारका )में से एक है | वो जगरन्नाथ पूरी जिसे धरती का वैकुण्ठ कहा जाता है | जगरन्नाथ पुरी जो रथ यात्रा के लिए प्रमुख मानी जाती हैं | रथ यात्रा जिसका वर्णन ब्रह्मा पुराण,पद्मा पुराण, स्कंद पुराण और कपिला संहिता में भी पाया जाता है |
युतो आमतौर पर भगवान जगरन्नाथ की साल में कई यात्रा निकाली जाती है परन्तु यथ यात्रा उनमे से प्रमुख है |हर साल बड़े धूम -धाम और बड़े ही हर्ष उल्लास से भगवान श्रीजगरन्नाथ,सुभद्रा और बलदेव की भव्य रथ यात्रा निकली जाती है |यह हर ओड़िशा वासियों के लिए प्रमुख त्यौहार है |यह रथ यात्रा न केवल भारत अपितु विश्व भर में बहुत चर्चित है |इसे देखने के लिए श्रद्धालु देश -विदेश से आते है |यह दुनिया में होने वाली सबसे बड़ी और पुरनी रथ यात्रा है |
रथ यात्रा की तैयारी दो महीने पुर्व अक्षय तृतीया से शुरू हो जाती है | इस दिन से ही भगवान श्री जगन्नाथ,बलभद्र और देवी सुभद्रा के तीन अलग -अलग विशाल और दिव्य रथ निर्माण /बनना शुरू हो जाता हैं | इस रथ को बड़े ही सुन्दर और पारम्परिक तरह से सजाया जाता हैं | भगवान श्री जगरन्नाथ के रथ में कुल 832 ,सुभद्रा देवी के रथ में कुल 593 और बलभद्र के रथ में कुल 763 लकड़ियों का इस्तेमाल होता है तथा रथ को खींचने के लिए इसमें 16,12 और 14 पहिये लगाए जाते है | भगवान श्री जगन्नाथ के रथ के आगे सफेद घोड़े लगाए जाते है तथा उनके रथ के ऊपर जो झण्डा लगाया जाता है उसे त्रैलोक्यमिनीकहते है और देवी सुभद्रा के रथ के आगे लाल घोड़े लगाए जाते है तथा उनके रथ के ऊपर जो झण्डा लगाया जाता उसे नदम्बिका है और भगवान श्री बलदेव के रथ के आगे काले घोड़े लगाए जाते है तथा उनके रथ के ऊपर जो झण्डा लगाया जाता है उसे उन्नानी कहते हैं | भगवान जगरन्नाथ के रथ के द्वारपाल "जय और विजय " तथा देवी सुभद्रा के रथ के द्वारपाल "गंगा और जमुना" और बलभद्र के रथ के द्वारपाल "नंदा और सुनंदा " हैं | भगवान श्री जगरन्नाथ जी के रथ को लाल और पीले रंगो से सजाया जाता है देवी सुभद्रा के रथ को लाल और काले और बलभद्र के रथ को लाल और हरे रंग से सजाया जाता है |भगवान जगन्नाथ के रथ को "नंदी घोष "या "गरुड़ ध्वज "तथा बलभद्र के रथ को "तालध्वज" और देवी सुभद्रा के रथ को "दर्पदलन"या "पद्म" कहते है |
रथ यात्रा का त्यौहार हर साल आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीय तिथि को मनाया जाता है | इस दिन पुरी के प्रमुख भगवान श्रीजगन्नाथ,भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा और सुदर्शन चक्र की बड़े -बड़े रथों में मुख्य
मंदिर से दो किलोमीटर दूर गुंडिचा मंदिर तक रथ यात्रा निकली जाती है| यह रथ यात्रा का उत्सव केवल एक दिन का नहीं होता हैं यह उत्सव कई दिनों का होता है | रथ यात्रा से पन्द्रह दिन पुर्व(ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा) को भगवान श्रीजगन्नाथ , सुभद्रा और बलभद्र की स्नान यात्रा होती हैं | इस दिन भगवान् श्रीजगन्नाथ का प्रागट्ये हुआ था |इस लिए इसे भगवान् के जन्म दिन से भी जाना जाता है | इस दिन भगवान् की प्रतिमा को गर्भगृह से बाहर निकला जाता है और स्नान बेदी पर रखा जाता है और 108 घडो (जिसमे अलग -अलग कुओं का जल होता है) से शाही स्नान कराया जाता है उसके बाद ग़जा वेश वाली पोशाक धारण कराई जाती हैं | स्नान यात्रा के बाद पन्द्रह दिन तक भगवान श्री जगरन्नाथ ,देवी सुभद्रा और बलभद्र के दर्शन नहीं होते | ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कहा जाता है की शाही स्नान से भगवान की तबीयत ख़राब हो जाती हैं और उन्हें बुखार हो जाता हैं और तब गर्भगृह में उनको औषधि और जड़ी - बूटियों से उपचार किया जाता हैं | तभी वह इन पन्द्रह दिन अपने भक्तो को दर्शन नहीं देते हैं | इससे ठीक पन्द्रह दिन बाद बड़े धूम -धाम से भगवान की रथ यात्रा निकली जाती हैं | सबसे आगे बड़े भाई बलभद्र का रथ जाता हैं उनके पीछे उनकी छोटी बहन सुभद्रा उसके बाद अंत में भगवान जगरन्नाथ का रथ निकलता हैं |भगवान अपने मंदिर से गुंडिचा मंदिर अपने नन्हियाल जाते है |
कहा जाता है कि रथ यात्रा इसलिए निकाली जाती है ताकि जो भक्त मंदिर में नहीं जा सकते और भगवान के दर्शन नहीं कर सकते उनके लिए स्वयं भगवान मंदिर से रथ यात्रा के बहाने बहार आते हैं और दर्शन देते हैं ताकि उनका भी उद्धार हो सके | भक्त अपने प्रभु की एक झलक पाने को बहुत उत्सुक होते है | और ये भी कहा जाता है कि रथ को खीचने से जन्म -जन्म के पाप खत्म हो जाते है और उनको स्वर्ग में वास मिलता है |भगवान के रथ की रस्सी को एक बार हाथ लागाने के लिए केवल दूर -दूर से भक्त आते है | भगवान श्री जगन्नाथ अपनी दोनों भुजा खोलके भक्त को अपने पास बुलाते है | भगवान कहते है तुम मेरे पास आने के लिए एक कदम आगे भड़ोगे तो मैं तुम्हारे पास दो कदम आगे बढाउँगा |
तो हम उम्मीद करते है की आपको अब पता चल गया होगा की क्यों हर साल भगवान श्री जगरन्नाथ देवी सुभद्रा और बलभद्र की रथ यात्रा निकली जाती हैं |
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1 टिप्पणियाँ
Nice information
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