हरे कृष्ण
आज हम आपको देवशयनी एकादशी के बारे में जानकारी देंगे | एकादशी व्रत का क्या महत्त्व है इस व्रत को करने से क्या लाभ होता हैं | किन- किन बातों का ध्यान रखना चाहिए व्रत करते समय | किस प्रकार व्रत रखना चाहिए |
देवशयनी एकादशी
एकादशी व्रत जिसका हिन्दू धर्म में बहुत महत्त्व बताया गया है | एकादशी व्रत जो सब व्रत में उत्तम हैं | जिसे करने के बाद और कोई व्रत करने की जरुरत नहीं रह जाती | एकादशी व्रत भगवान कृष्ण / विष्णु को अति प्रिय हैं | एकादशी व्रत करने से जन्मों -जन्मों के पाप नस्ट हो जाते हैं और अंत में विष्णु लोक की प्राप्ति होती है |
एकादशी व्रत जो हर महीने में दो बार आती है | एक बार कृष्ण पक्ष में और एक बार शुक्ल पक्ष में तो ऐसे कुल साल में 24 एकादशी आती है | एकादशी का व्रत सभी मनुष्य को करना चाहिए चाहे वो बच्चे हो या बड़े, स्त्री हो या पुरुष |
आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को देवशयनी एकादशी कहते हैं | इसे प्रबोधिनी एकादशी, महा एकादशी, पद्मा एकादशी इत्यादि अलग-अलग नामों से भी जाना जाता है | इस दिन से चातुर्मास का भी आरम्भ हो जाता है | शास्त्रों के अनुसार इस दिन से भगवान हरी विष्णु लगभग चार मास के लिए क्षीरसागर में शयन(विश्राम ) करने चले जाते है | और इसके बाद उन्हें देवोत्यानी एकादशी में उठाया जाता है | इस समय को ही चातुर्मास कहा जाता है | इन चार महीनों में कोई भी विवाह, गृह प्रवेश, यज्ञ आदि धर्म कर्म से जुड़े कोई भी शुभ कार्य नहीं किये जाते हैं | इन चार महीनो में केवल किर्तन व स्मरण किया जाता हैं | पद्म पुराण और श्रीमद्भगवत के अनुसार हरिशयन को योगनिद्रा भी कहा जाता है |
ग्रन्थ पुराण के अनुसार ये भी कहा गया है कि भगवान हरी ने वामन रूप में दैत्त बलि के यज्ञ में तीन पग दान के रूप में मांगे थे | जिसमे भगवान ने पहले पग में पूरी पृथ्वी,आकाश और सभी दिशाओ को ढक लिया और दूसरे पग में सम्पूर्ण स्वर्ग लोक को ले लिया और तीसरे पग में बलि ने अपने आप को समर्पित करते हुए सिर पर पग रखने को कहा | इस प्रकार के दान से प्रसन होकर भगवान ने बलि को पाताल लोक का अधिपति बना दिया और बलि से वर मांगने को कहा तब बलि ने वर मागंते हुए भगवान से कहा के आप सदैव मेरे महल में वास करे | तब बलि के बंधन में बंधा देख भार्या लक्ष्मी में बलि को भाई बना लिया और भगवान से बलि को वचन से मुक्त करने का अनुरोध किया | तब उस दिन से भगवान विष्णु के द्वारा वर का पालन करते हुए तीनो देवता( ब्रह्मा, विष्णु और महेश) 4 -4 माह सुतल में निवास करते है |
भगवान विष्णु देवशयनी एकादशी से लेकर देवउठनी एकादशी तक , शिवजी महाशिवरात्रि तक और ब्रह्मा जी शिवरात्रि से देवशयनी एकादशी तक निवास करते है |
पुराणों में कहा गया है जो मनुष्य एकादशी व्रत करते है तो मृत्यु के बाद उन्हें यमदूत नहीं आते | उन्हें भगवान के दूत लेने आते हैं | और साथ ही ये ही कहा गया हैं की उनको चौरासी लाख योनियों में नहीं भटकना पड़ता उनका अगला जन्म मनुष्य का ही होता है |
एकादशी का व्रत कैसे रखे और एकादशी व्रत करते समय व्रत से जुड़े कुछ नियम का पालान/ध्यान अवश्य रखना चहिये
एकादशी से एक दिन पहले संध्या को जल्दी भोजन कर अगले दिन सुबह जल्दी उठकर स्न्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनने चाहिए और फिर भगवान विष्णु/कृष्ण का ध्यान और पूजन करना चाहिए | और इस दिन ज्यादा से ज्यादा भगवान का स्मरण और कीर्तन व नाम जप करना चाहिए | इस व्रत को हर उम्र के मनुष्य को करना चाहिए चाहे वो शादी-शुदा हो या ना हो और चाहे व स्त्री हो या पुरष | इस दिन किसी की निन्दा नहीं करनी चाहिए | इस दिन हो सके तो केवल संध्या कल में भगवान को अर्पित करके ही एकादशी प्रशाद गहन करना चाहिए | इस दिन रत को सोना नहीं चाहिए और रात्रि को भगवान का जागरण करना चाहिए | और अगले दिन द्वादशी को सुबह जल्दी उठकर भगवान का पूजन आदि करके भाह्माण को दान देकर अपना व्रत तोड़ना चाहिए |
एकादशी के दिन भूल कर भी चावल और चावल से बानी कोई भी वास्तु का सेवन न करे |
किसी को परेशान या सताना नहीं चाहिए |
देवशयनी एकादशी व्रत कथा
धर्मराज युधि युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा - हे जनार्दन! आषाढ़ शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? इस व्रत के करने की विधि क्या है और किस देवता का पूजन किया जाता है? तब श्री कृष्ण युधिष्ठिर से कहते है सुनो एक समय नारदजी ने ब्रह्माजी से यही प्रश्न किया था तब ब्रह्माजी ने उत्तर दिया की हे नारद! तुमने कलयुग जीवों के उद्धार हेतु अतिउत्तम प्रश्न किया है, क्युकी एकादशी व्रत सभी व्रतों में श्रेष्ठ है और इस व्रत से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं, और जो व्यक्ति इस व्रत को नहीं करते वे नरकगामी होते हैं | सभी एकादशी के व्रत श्रेष्ठ हैं और उनको करने से भगवान हरी विष्णु/कृष्ण प्रसन होते हैं परन्तु उन सब में भी इस देवशयनी एकादशी तो सबसे अधिक पुण्य दायक व फल देने वाली हैं | इस एकादशी से सम्भंदित पुराणों मे वर्णित एक कथा है तुम उसे ध्यानपूर्वक सुनो -:
सतयुग में मान्धाता नाम का एक सूर्यवंशी राजा था, जो सत्यवादी और महान प्रतापी था | वह प्रजा का पुत्र की तरह पालन किया करता था | उसकी प्रजा धन-धान्य से भरपूर और सुखी थी | उसके राज्य में कभी अकाल नहीं पड़ता था | एक समय उस राजा के राज्य में तीन वर्ष तक वर्षा नहीं हुई और अकाल पड़ गया | प्रजा अन्न के कमी के कारण अत्यंत कष्ट पाने लगी और अन्न के अभाव के कारण यज्ञ आदि भी बन्द हो गये |
किसी भी त्रुटि या सुझाव के लिए नीचे दिए गए ईमेल पर संपर्क कर सकते है या फिर अपना कमेंट नीचे छोड़ सकते हैं |
तो हम आशा करते है की अब आपको देवशयनी एकादशी से जुडी सारि जानकारी पता चल गई होगी |
यह जानकारी आपको कैसी लगी ये आप हमें कमेंट करके ज़रूर बताये | और अगर आपको यह जानकारी अच्छी लगी हो तो और ऐसी जानकारी के लिए आप हमारे divyagyanoo पेज से जुड़े रहे |
या फिर आप हमारी वेबसाइट "www.divyagyanoo.blogspot.com " से जुड़े रह सकते हैं | और ऐसी ही रोमाँचक
जानकारी प्राप्त कर सकते हैं |
आप हमारे यूट्यूब चैनल को भी फॉलो कर सकते हैं - https://youtube.com/channel/UC-u5xle-M7AfvifiC4edkkg जहा आप मधुर भजन व गीत भी सुन सकते हैं और इसका आनंद ले सकते हैं |
और साथ ही हमारे फेसबुक पेज को भी फॉलो कर सकते है https://www.facebook.com/divyagyanoo/

0 टिप्पणियाँ
Thank you for message