चतुर्मास का महत्व || ChaturMas Ka Mahatv

हरे कृष्ण 


 चातुर्मास का महत्व 


चातुर्मास का हमारे शास्त्रों में बहुत महत्व बताया गया है | जिन दिनों में भगवान श्री हरी विष्णु शयन करते है उन चार महीनों को चातुर्मास और चौमास भी कहा जाता  हैं |  

स्कन्द पुराण  के अनुसार संसार में मनुष्य जन्म और विष्णु भक्ति दोनों को ही अति दुर्लभ बताया गया है | और चातुर्मास में भगवान विष्णु का व्रत करने वाला मनुष्य ही उत्तम एवं श्रेस्ट माना  गया है | चातुर्मास के इन चार मास में सभी तीर्थ, दान, पुण्य और देव स्थान भगवान श्री विष्णु की शरण लेकर स्थित होते हैं | तथा चातुर्मास में भगवान विष्णु को नियम से प्रणाम करने वाले मनुष्य का जीवन भी शुभ फल दायक बन जाता हैं |    

इन चार महीनों में विभिन्न धार्मिक कर्म करने में मनुष्यो को विशेष पुण्य और लाभ प्राप्त होता हैं | क्युकि इन महीनों में किसी भी जीव  के द्वारा किया गया कोई भी पुण्य कर्म खाली नहीं जाता | इस काल से भगवान के उठने तक चार महीने उनके गुण का श्रवण व कीर्तन करके वैष्णव इस व्रत का पालन करते हैं | चातुर्मास का प्रारम्भ देवशयनी एकादशी (आषाढ़ी एकादशी), द्वादशी, अष्टमी, पूर्णमासी या फिर संक्रांति से कर सकते हैं | यह  महीने अत्यन्त महत्वपूर्ण इस लिए है क्युकि इस समय भगवान शयन करते हैं |इन महीनों में भगवान नारायण क्षीरसागर में योगनिद्रा में रहते हैं और कार्तिक मास कि उत्थान एकादशी को उठते हैं | भगवान सदैव गुणातीत हैं | तीनों गुण (सतोगुण,रजोगुण, तमोगुण, ) उनके अधिन रहते हैं | भगवान की निंद को योग निद्रा कहा जाता हैं | उनकी चेतना सदैव परिपूर्ण अवस्था में रहती हैं | वास्तव में यह भगवान की एक लीला हैं | इन चार महीनो में वर्षा भी अधिक होती हैं जिससे इस समय भर्मण करना भी कठिन हो जाता है | तभी जो वैष्णव गण पुरे संसार में भ्रमण करके भगवान के नाम का प्रचार आदि करते है वह भी इस समय एक स्थान पर रह कर भगवान की पूजा आराध्ना करते हैं | 




अब हम आपको चातुर्मास की एक बहुत ही सुन्दर व् प्रसिद्ध कथा बताएगें 



एक बार नारदजी के शिष्य व्यास देव ने नारद जी से पूछा वह भक्ति में वह कैसे आये तब नारद जी ने उन्हे अपने पूर्व जन्म का विवरण देते हुए बताया की मै अपने पूर्व जन्म में अपनी माता के साथ एक ब्राह्मण के गुरुकुल  में निवास करता था और  एक बार चातुर्मास के समय अनेक, विशेष, महान तपस्वी ऋषि वह पर आए और चार महीने वही आश्रम पर रुके | उनके संग और अनुमति से प्राप्त उनके महाप्रसाद से भगवन नाम में निष्ठा और रूचि बढ़ी | और मेरी सेवा व मेरे वेवहार से प्रसनं होकर जाते-जाते उन्होंने मुझे भगवान की भक्ति के विषय में मुझे अत्यंत गुह्य ज्ञान प्रदान किया | जिससे मैने भक्ति करनी प्रारम्भ की व अन्ततः मुझे भगवान के दर्शन प्राप्त हुए | 




चातुर्मास के कुछ विशेष नियम 

पद्म पुराण के अनुसार जो मनुष्य इन चार महीनों में मन्दिर में झाड़ू  लगाते हैं व मंदिर को धोकर साफ़ करते हैं या फिर मंदिर के फर्श को गाय के गोबर  हैं उन्हें सात जन्मो तक  प्राप्ति होती हैं | 

जो मनुष्य भगवान को पंचामृत (दूध,दही,शहद,घी और मिश्रि ) से स्नान कराते हैं  वह संसार में वैभवशाली होकर स्वर्ग में इंद्र जैसा सुख भोगते हैं | 

जो व्यक्ति भगवन का  धुप,दीप,नवैद्य और पुष्प आदि से पूजन करता है वह अक्षय सुख भोगता हैं | 

जो मनुष्य विद्वान ब्राह्मण को 28 या 108 मिट्टी के बर्तन में तिल भरके दान करता है वह काया,त्वचा व मन से किए गए सभी पापो से मुक्त होता हैं  

चातुर्मास में जो भी मनुष्य भगवान विष्णु के सामने गायन करता हैं उसे गन्धर्व लोक  प्राप्ति होती हैं | 

जो गुड़ का त्याग करता हैं उसे पुत्र- पौत्र की प्राप्ति होती हैं | 

तेल का त्याग करने से व्यक्ति रूप वान होता है और उसके सभी शत्रुओं का नाश होता हैं | 

जो व्यक्ति भगवान की परिक्रमा करता है वह हंस विमान में भगवत धाम को जाता हैं  | 

चातुर्मास के पहले महीने अर्थात सावन मास में साग,एवं हरे पत्तेदार सब्जियाँ , दूसरे महीने अर्थात भादों में दही , तीसरे महीने अर्थात अश्विन में दूध ,और चौथे महीने अर्थात कार्तिक मास में उरद की दाल खाना वर्जित  हैं | 


 इन चार महीनों में किसी की निंदा या  चुगली ना करे | तथा न ही किसी से धोके से किसी का कुछ हथियाना नहीं चाहिए | 

इन चार महीनों कोईभी मंगल कार्य जैसे विवहा, ग्रह प्रवेश आदि नहीं किया जाता है | ऐसा इसलिए क्युकि इन 
चार मास में केवल और केवल भगवान की भक्ति में लीन रहा  जाता हैं |और  भगवन की  अर्चना की  है |   और अगर वैज्ञानिक द्रष्टि से देखा जाए तो बदलते मौसम यानि वर्षा ऋतु का मध्य और शरद ऋतु का आरम्भ होने से जलवायु परिवर्तन तथा ऋतु संक्रमण होने के कारण भोजन व  जल में हानिकारक जीवाणु की विर्धि हो हैं | जिससे शरीर में रोगों से मुकाबला करने की क्षमता यानि रोग प्रतिकारक शमता  बेहद काम हो जाती है | तब आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करने के लिए व्रत करना, उपवास रखना और ईश्वर की आराधना करना अत्यंत लाभदायक मन जाता है |  
युतो चातुर्मास के अनेक नियम है परन्तु जितना हो सके उतना उनका पालन करना चाहिए | और इन सब का लक्ष्य भगवान श्री विष्णु / कृष्ण की प्रेममय भक्ति प्राप्त करना होना चहिय|   जिस  प्रकार नारदमुनि को भगवत भक्ति प्राप्त हुई | 

भगवान श्री कृष्ण ने भगवतगीता में विभिन प्रकार के यज्ञों का उल्लेख किया है जिनसे विभिन भोग व ऐश्वर्य की प्राप्ति होती हैं | जिनमें सबसे प्रमुख व महत्वपूर्ण यज्ञ है श्री हरी कीर्तन | 

तो सब मनुष्य को इन चातुर्मास में ज्यादा से ज्यादा श्री हरी का कीर्तन,भजन व पूजन आदि ज्यादा से ज्यादा करना चाहिए|  
   







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