हरे कृष्णा
आज हम आपको साल के अंत में पड़ने वाली एकादशी के बारे मे विस्तार में पूरी जानकारी देंगे | इस एकादशी का नाम, महत्त्व और इसके पिछे की कथा |
सनातन धर्म में एकादशी व्रत जिसे सभी व्रतों में श्रेस्ट माना जाता हैं | जिस व्रत को करने से सभी व्रतों का फल प्राप्त हो जाता है | जिसे करने से जीव के सारे पाप नस्ट हो जाते हैं | जिसे करने से भगवान कृष्ण / विष्णु प्रसन्न जो जाते है |
साल में कुल 24 एकादशी आती है, हर माह में दो एक कृष्ण पक्ष में और दूसरी शुक्ल पक्ष में | आज हम बात करने वाले है इस साल के अंत में पड़ने वाली एकादशी के बारे मे | क्या है इस एकादशी का महत्त्व, पूजा विधि और इसकी कथा |
दिसंबर 30, 2021 के अंत में पड़ने वाली एकादशी का नाम है सफला एकादशी | हिन्दू कैलेंडर के अनुसार पौष मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को सफला एकादशी कहा जाता है |
भविष्यउत्तर पुराण के अनुसार एक दिन महराज युधिष्टर भगवान श्री कृष्ण से एक सवाल पूछते है , हे! मेरे प्रिय कृष्ण आप कृपया कर मुझे बताइये पौष मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी व्रत का पालन किस प्रकार किया जाता है, इस दिन किस भगवान की पूजा ,उपासना व ध्यानव आदि किया जाता है और इस दिन की कथा किस प्रकार है | तब भगवान श्री कृष्ण उत्तर देते हुए इस एकादशी का गौरव कहते है| हे राजाओं में श्रेस्ट युधिष्टर जिस प्रकार सभी सर्पों में श्रेस्ट शेषनाग है, सभी पक्षियों में श्रेस्ट गरुड़ राज है, सभी नदियों में श्रेस्ट गंगा नदी है, सभी यज्ञों में श्रेस्ट अश्वमेघ यज्ञ है और सभी देवों में श्रेस्ट विष्णु हैं उसी प्रकार सभी व्रतों में श्रेस्ट एकादशी व्रत है | इसलिए मैं इसके अतिरिक्त किसी भी व्रत, यज्ञ व दान आदि से प्रसन नहीं होता | और जो मनुष्य एकादशी व्रत करते है वह मुझे बहुत प्रिय है |
तब भगवान आगे कहते है पौष मास की कृष्ण पक्ष में आने वही एकादशी को सफला एकादशी भी कहते है | इस दिन अलग-अलग फलों का भोग लगाके धूप-दीप से भगवान नारायण का पूजन किया जाता हैं | इस दिन पूरी रात भगवान की कथा का श्रवण व उनका कीर्तन करना चाहिए | जो एकादशी व्रत का पालन करता है व मेरे द्वारा पूजनिए होता है |
इसके उपरांत भगवान श्री कृष्ण महराज युधिष्टर को इस एकादशी की कथा सुनते है
भगवान श्रीकृष्ण कहते है एक बार एक विशाल राज्य हुआ करता था जिसका नाम हुआ करता था चम्पावटी | जिसके राजा हुआ करते थे राजा महेष्मता | उस राजा के चार पुत्र थे, जिसमे से सबसे बड़े पुत्र का नाम था लुम्बक | और दुर्भाग्यवश यह पुत्र बहुत पापी था | वह दुसरो की पत्नियों के साथ जोर-जबरदस्ती करता था और साथ ही उसे कई बुरी आदते थी जैसे जुआ खेलना, मास खाना और सभी ब्राह्मण व वैष्णवों से द्वेष करना आदि हमेशा उनकी निंदा करता था | इन सब कारणों से उसके पिता का सारा धन धीरे-धीरे खत्म हो रहा था | तो जब राजा में अपने पुत्र का ऐसा स्वाभाव देखा तो व समझ गए की उनका पुत्र शमा करने योग्य नहीं है | तब उन्होंने अपने पुत्र को अपने राज्य से निष्काषित कर दिया | तब लुम्बक ने सोचा की क्युकि मेरे पिता ने मुझे घर से निकल दिया है इसलिए मै दिन में जानवरों को मरुँगा और उनका मॉस खाऊंगा और साथ ही रात को लोगो के घर में चोरी करुँगा | और इस प्रकार उसका पापम्य जीवन दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा था | उसकी दिनचर्या पाप से शुरू होती थी और पापम्य कार्यो से ही खत्म होती थी | तब हुआ यु सफला एकादशी से एक दिन पूर्व रात्रि में लुम्बक को ठण्ड लग रही थी और वह बहुत काँप भी रहा था | पूरी रात्रि वह सो भी नहीं पाया | अगले दिन उसका स्वास्त इतना ख़राब हो गया की वह बिलकुल उठ ही नहीं पा रहा था | तब दोपहर के समय जब थोड़ी गर्मी हुई तब उसने चलने का प्रेयत्न किया परन्तु उसके हाथ-पैर इतने कप रहे थे कि वह चल ही नहीं पाया | उसमे तनिक भी शक्ति नहीं थी कि वः जंगल में जाकर जानवरों को मारकर उनका मॉस खा सके | तब उसने आस-पास से गिरे वृक्षों के फल को एकत्रित किया और अपने वृक्ष के नीचे बैठ गया और बड़े ही दुखत अवस्ता में भगवान से प्रार्थना करने लगा कि हे हरि आप मुझपर कृपा कीजिए और इन फलो को स्वीकार कीजिए |
तो इस प्रकार उसने न चाहते हुए अंजाने में इस एकादशी का व्रत किया और साथ ही भगवन को भोग भी लगाया |
भगवान इतने कृपालु और करुणामई है कि अगर कोई भी मनुष्य उनको एक बार भी कुछ भी समर्पित करता है तो वह उसे स्वीकार अवश्य करते है | तब भगवान लुम्बक की सेवा से इतने प्रसन्न हुए की उन्होंने उसे एक वरदान भी दिया | तब एकादशी के अगले दिन लुम्बक के सामने एक सफेद घोड़ा आकर खड़ा हो गया और तब एक आकाशवाणी हुई भगवान हरि की कृपा से और सफला एकादशी के कारण लुम्बक के सारे पाप नस्ट हो गए है और उसे अपना राज्य भी वापस मिल गया है | और वह इस घोड़े पर बैठकर वापस जा सकता था | तो इस प्रकार लुम्बक का जीवन पूरी तरह से बदल गया और नहीं उन्होंने अपने पिता का राज्य सम्हाला बल्कि साथ ही वह भगवान कृष्ण के बहुत ही बड़े भक्त बन गए | और वृद्धावस्ता में अपने राज्य सहित अपने सरे उत्तर्दयित्यों को अपने पुत्र को सौप कर स्वयं के मन और इन्द्रियों को कृष्ण को समर्पित कर दिया | इसके बाद लुम्बक अपनी सारी भौतिक इछाओं से शुद्ध होकर अपने भौतिक शरीर को त्याग कर श्री कृष्ण के धाम को लोट गए।
और भगवान श्री कृष्णा युधिष्टर महराज को बता रहे है जो भक्त इस कथा का केवल श्रवण करता है उसे राजसु यज्ञ का फल मिलता है, और जो भक्त इस एकादशी का पूरी निष्ठां से पालन करता है उसे पाँच हजार साल की तपस्या का फल मिलता है |
तो इस प्रकार सफला एकादशी की कथा पूरी होती है |
तो हम आशा करते है आपको सफल एकादशी से जुडी यह जानकारी बहुत अच्छी लगी होगी |
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