हरे कृष्ण
आज हम आपको साल के पहले एकादशी के बारे में विस्तार से पूरी जानकारी देंगे | कब है ये एकादशी , इसको करने का क्या महत्व है और इसकी कथा |
सनातन धर्म में हर व्रत का अपना कोई ना कोई महत्व है और उसमें भी एकादशी व्रत की तो महिमा ही अनंत है | एकादशी जिसे सभी व्रतों में सबसे श्रेठ माना जाता हैं | जिसे करने से सभी व्रतों का फल प्राप्त हो जाता है | जिसे करेने से जिव के जन्मो - जन्मो के पाप नष्ट हो जाते है | जिस व्रत से भगवान कृष्ण / विष्णु मनुष्य से अति प्रसन्न होते है | एकादशी व्रत के पालन से धर्म,अर्थ, काम और मोक्ष के प्राप्ति होती है |
यू तो हर महीने में दो एकादशी आती है, एक शुक्ल पक्ष में और दूसरी कृष्ण पक्ष में | उन्हीमें से एक एकादशी के बारे में हम आज आपको बताने जा रहे है |
साल 2022 की पहली एकादशी 13 जनवरी को है जिसका नाम ह पुत्रदा एकादशी है | क्या है इस एकादशी का महत्व, और इसकी कथा |
पुत्रदा एकादशी व्रत कथा
भविष्य पुराण में भगवान श्री कृष्ण और महराज युधिष्ठिर के संवाद में पुत्रदा एकादशी का वर्णन मिलता है | एक बार महराज युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण से पुछा की हे भगवान मुझे पौष मास के एकादशी के विषय में बताइए | इस एकादशी की विधि क्या है और इस दिन किस देवता की पूजा की जाती है | तब इस पर भगवान श्री कृष्ण ने कहा -
जगत कलयाण हेतु मै इस एकादशी का वर्णन करुगा इसे पुत्रदा एकादशी कहते है | सब पापों का हरण करने वाली यह सर्वोत्तम तिथि है | पुरे त्रिलोक में यह सबसे उत्तम तिथि है | अब मै तुम्हें इसकी कथा बताने जा रहा हूँ , तुम इसे ध्यान पूर्वक सुनो |
प्राचीन समय में भद्रावती नगरी में सुकेतुमान नाम का एक राजा राज्य करता था | उसकी कोई भी सन्तान नहीं थी | उसकी पत्नी का नाम शव्य था | उस पुत्रहीन राजा के मन में यह चिन्ता थी कि उसके बाद उसे और उसके पूर्वजों को कौन पिण्ड दान देगा | इसके पितृ भी वितरित हो पिण्ड लेते थे कि सुकेतुमान के बाद हमें कौन पिंड का दान करेगा | इधर राजा भी बंधु-बांधो, राज्य,हाथी ,घोड़े से संतुष्ठ नहीं था | उसका एकमात्र कारण पुत्रहीन होना था | बिना पुत्र के पितरो और देवताओं से उरण नहीं हो सकते | इसी तरह राजा रात-दिन इसी चिंता में रहता था | इस चिंता के कारण वह इतना दुखी हो गया कि उसके मन में अपने इस शरीर को त्याग देने की इच्छा उत्पन हो गयी | तब वह सोच ने लगा की आत्महत्या करना तो महा पाप है और फिर उसने इस इच्छा को अपने मन से निकाल दिया | तब एक दिन इन्ही सब विचारों को मन में रख कर वह घोड़े पर सवार होकर वह चल दिया |
घोड़े पर सवार राजा वन,वृक्ष और पक्षियों को देखने लग गया | उसने देखा की वन में व्रिग, बाघ, सिंग और बन्दर आदि विचरण कर रहे है , हाथी शिशुओं वह हथनियों के संग विचरण कर रहे है | वन के उस दृश्य को देख राजा और भी दुखी हो गया की उसके पुत्र क्यों नहीं है | इसी सोच विचार में दोपहर हो गयी | वह सोचने लग गया की मैंने तो इतने यज्ञ किये है, ब्राह्मणों की इतनी सेवा की है फिर भी मुझे इतने कष्ट क्यों | आखिर इसका कारण क्या है | मै किस से जाकर अपनी समस्या कहु | कौन है जो मेरे इस समस्या का निवारण कर सकता है |
अपने ख़यालो में खोये राजा को प्यास लगी | वह पानी की तलाश में आगे बढ़ा | कुछ दूर जाने पर उसे एक सरोवर मिला | उस सरोवर में कमल पुष्प खिले हुए थे | सारस, हंस, घड़ियाल आदि जल क्रीड़ा में मग्न थे | सरोवर के चारो ओर ऋषिओं के आश्रम बने हुए थे | अचानक राजा के दाहिने अंग फड़कने लगे | इसे शुभ शगुन समझ राजा घोड़े से निचे उतरा और सरोवर के किनारे बैठे ऋषियों को प्रणाम कर उनके समक्ष बैठ गया | तब वहा बैठे ऋषिगण बोले हे राजन हम तुमसे बहुत प्रसन्न है तुम्हारी जो इच्छा है हम से कहो | इसपर राजा ने उनसे पूछा हे ऋषि आप कौन है और आप किस लिए यहाँ रह रहे है | इसपर ऋषि बोले आज पुत्र की इच्छा करने वाले को श्रेस्ट पुत्र प्रदान करने वाली पुत्रदा एकादशी है | आज से पाँच दिन बाद माघ स्नान है और हम सब इस सरोवर में स्नान करने आए है | ऋषियों की बात सुन राजा ने कहा हे ऋषियों मेरा भी कोई पुत्र नहीं है | यदि आप मुझ पर प्रसन्न है तो मुझे भी एक पुत्र का वरदान दीजिये | तब ऋषि बोले हे राजन आज पुत्रदा एकादशी है आप इसका उपवास कीजिये | भगवान श्री हरी की इच्छा से अवश्य ही आपका पुत्र होगा | राजा ने ऋषि-मुनि के वचन के अनुसार उस दिन उपवास किया| और द्वादशी को व्रत का पारण किया | और ऋषियों को प्रणाम कर वापस अपनी नगरी लोट आया |
भगवान श्री हरी की कृपा से कुछ दिन बाद ही उसकी रानी ने गर्ब धारण किया और नो माह पश्चात् उसका एक तेजस्वी पुत्र उत्पन हुआ | यह राजकुमार बड़ा होने पर अत्यंत वीर, धनवान और प्रजा का पालक बना |
इसकिये हे राजन पुत्रदा एकादशी का पालन अवश्य करना चाहिए | जो कोई भी इस व्रत का पालन करता है उसे पुत्र की प्राप्ति होती है और अंत में वह मनुष्य स्वर्ग लोक को प्राप्त होता है | और जो कोई मनुष्य इस कथा को पढ़ता,सुनता या फिर कहता है उसे अश्वमेघ यज्ञ की प्राप्ति होती है |
इस दिन अन्न वर्जित होता है | चावल तथा उससे बनी वास्तु, गेहूँ , ज्वार, मक्का, दाल , राई व् तिल का तेल यह सब चीज़ वर्जित होती है | इनका सेवन इस दिन नहीं करना चाहिए |
हम आशा करते है आपको पुत्रदा एकादशी से जुड़ी सभी जानकारी मिल गई होगी | और हम यह भी आशा करते है की यह जानकारी आपको अच्छी लगी होगी |
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